दोस्ती(Dosti)

जीवन में जिसे सच्चा मित्र मिल गया-समझो सब-कुछ मिल गया.उन सभी दोस्तों के लिए जिनको ऎसा मित्र मिल गया हॆ या जो उसकी तलाश में हॆं

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गुलाब

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rose1गुलाब

कई बार
चाहा हॆ
तेरे नर्म होंठों पर
रख दूं,
अपने
गर्म होंठ.
तेरी खुशबू को
बसा लूं
अपने दिल में.
ऒर पी जाऊं
तेरी सुन्दरता को
इन नयनों से
हाला समझकर.
लेकिन-
तेरे
जिस्म के चारों ओर
खडे पहरेदारों को देखकर
सहम जाता हूं
ऎ! गुलाब.

*****************

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29 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

chandrabhan kumar के द्वारा
June 22, 2012

मुहब्बत एक एहसानों की पावन सी कहानी है  कभी  कबीरादीवाना था कभी मीरा दीवानी है,यहाँ सब लोग कहते है मेरी आँखों में आसूँ हैं जो तू समझे तो मोती है जो न समझे तो पानी है !

chandrabhan kumar के द्वारा
June 22, 2012

i love rose

Jera के द्वारा
June 14, 2011

Thank God! Someone with brians speaks!

Munish के द्वारा
February 16, 2011

आदरणीय विनोद जी, जब आप गुलाब की सुन्दरता का वर्णन इस तरह से करेंगे, तो किसी का भी दिल मचल सकता है गुलाब पर, और फिर किसी न किसी को तो पहरेदारी करनी ही पड़ेगी, कांटे ही सही. http://munish.jagranjunction.com/2011/02/15/%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88%e0%a4%82/

    February 18, 2011

    मुनीश जी, यदि गुलाब को बचाये रखना हॆ तो सुरक्षा का प्रबन्ध तो करना ही पडेगा. धन्यवाद! आपकी सुंदर प्रतिक्रिया के लिए.

rajkamal के द्वारा
February 16, 2011

aadrniy विनोद जी …सादर प्रणाम ! सत्यानास हो इन कमबख्त कांटो का इन्ही के कारण तो हम आजतक कुंवारे बैठे है ….

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 16, 2011

    आदरणीय पाराशर जी, राजकमल भ्राता श्री की बातों से हम भी सहमत है. फिर भी सुन्दर पंक्तियों के लिए आभार,

    February 18, 2011

    भाई राजकमल जी, कांटों के डर से कब तक गुलाब से दूर रहोगे.किसी शायर ने कहा हॆ- ’रकीबों से रवीर अच्छे जो जलकर भी नाम लेते हॆं गुलों से खार बेहतर,जो दामन थाम लेते हॆं’

    February 18, 2011

    वाहिद भाई, हॊसला बढाने के लिए -शुक्रिया!

    Amelia के द्वारा
    June 14, 2011

    At last! Someone who understands! Tahnks for posting!

HIMANSHU BHATT के द्वारा
February 16, 2011

आदरणीय विनोद जी…. एक उत्कृष्ट रचना…. भावो से परिपूर्ण कविता… जो की बहुत सारगर्भित है…. आभार……………………

    February 18, 2011

    हिंमाशु जी, आपकी भावपूर्ण .उत्सावर्धक प्रतिक्रिया के लिए -धन्यवाद!

आर.एन. शाही के द्वारा
February 16, 2011

पराशर जी, हाला तो कंटकाकीर्ण नहीं होती । लेकिन कोई बहुत पुराना ग़ुबार निकाला है आपने शायद । बधाई ।

    February 18, 2011

    शाही जी, हाला से कभी हम प्याला हुआ नहीं,लेकिन कुछ लोगों का कहना हॆ कि यह जहां से होकर अंदर पहुंचती हॆ उस मार्ग को कंटकाकीर्ण बना देती हॆ. बाकि तो इस क्षेत्र का कोई उस्ताद ही बता सकता हॆ. हां! गुब्बार कभी गुब्बारे पर तो कभी गुलाब पर-आखिर कहीं तो निकलेगा ही..धन्यवाद!

    Delia के द्वारा
    June 14, 2011

    Glad I’ve finally found soetmnhig I agree with!

priyasingh के द्वारा
February 16, 2011

उत्तम प्रस्तुति ………. अंतिम पंक्तियों को पढ़कर ही इस कविता का सार समझ में आया ……… अर्थपूर्ण रचना……..

    February 18, 2011

    धन्यवाद! प्रिया जी- यदि अंतिम पंक्तियां हटा ली जाये,तो अर्थ का अनर्थ हो सकता हॆ

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 16, 2011

और यही अफसोस है की जिनके कारण वो सुंदर पुष्प कई लोगों द्वारा तोड़े जाने से बचा है उनही काँटों की कोई कदर नहीं…… फूल की सुंदरता मे सबसे बड़ा योगदान तो उनही का है अन्यथा वो फूल बनने से पूर्व ही तोड़ दिया जाता……….. सुंदर प्रस्तुति……….

    February 18, 2011

    पियूष जी, सच कहा आपने ,ये कांटे ही तो हॆं जो फूलों को लोगों की गलत नजर से बचाते हॆं,वर्ना यह चमन तो कभी का वीरान हो जाये.आपकी सार्थक टिप्पणी के लिए धन्यवाद!

deepak pandey के द्वारा
February 16, 2011

विनोद पराशर जी, बहुत सुन्दर कविता . अंतिम पंक्ति का अर्थ निकाल कर चेहरे पर मुस्कान आ गई.. :)

    February 18, 2011

    पाण्डे जी, आजकल चेहरे पर मुस्कराहट का आना बहुत दुर्लभ काम हॆ.गुलाब ने यह काम कर दिया. धन्यवाद!

Deepak Sahu के द्वारा
February 16, 2011

अदरणीय विनोद जी! सुंदर पंक्तियाँ प्रस्तुत की आपने ! बधाई! http://deepakkumarsahu.jagranjunction.com/2011/02/09/valentine-contest/ दीपक साहू

Alka Gupta के द्वारा
February 16, 2011

पाराशर जी , रचना की अंतिम पंक्तियों में बहुत ही गहन भाव छिपे हुए हैं…..! बहुत सुन्दर रचना !

    February 18, 2011

    अलका जी, पूरी कविता पढने के बाद ही,कविता का भाव समझ में आता हॆ-अन्यथा……… रचना आपको अच्छी लगी -आभार!


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