दोस्ती(Dosti)

जीवन में जिसे सच्चा मित्र मिल गया-समझो सब-कुछ मिल गया.उन सभी दोस्तों के लिए जिनको ऎसा मित्र मिल गया हॆ या जो उसकी तलाश में हॆं

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गुब्बारा!-Velintine contest

Posted On: 10 Feb, 2011 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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balloon-ride-jenna-fournierमित्रों!

कविता-साहित्य की वह विधा हॆ-जिसमें थोडें से शब्दों में ही बहुत कुछ कह दिया जाता हॆ.कभी कभी कविता से ऎसे ऎसे अर्थ भी निकल आते हॆं कि उस कविता के रचियता ने भी उस अर्थ की कल्पना नहीं की होती.दर-असल किसी भी शब्द का अर्थ-हमेशा एक जॆसा नहीं होता.वह समय-सापेक्ष होता हॆ.व्यक्ति विशेष पर भी निर्भर करता हॆ कि उससे वह कॊन-सा अर्थ लेता हॆ.कविता एक-लेकिन उसके भावार्थ अनेक.आज से लगभग 28 वर्ष पहले लिखी गयी यह कविता,अपने कालेज के दिनों में एक प्रतियोगिता में पढी थी-जिसे उस समय ’द्वितीय पुरस्कार’ मिला था.अब कविता पढकर-आप भी अपना अर्थ लगाइये-हो सके तो-अपनी प्रतिक्रिया द्वारा मुझे भी बताईये.

गुब्बारा

क्या-मॆं
तुम्हारे लिए
सिर्फ एक गुब्बारा हूँ
जिसमें जब जी चाहे
हवा भरो
कुछ देर खेलॊ
ऒर फिर फोड दो।
काश !
तुम भी गुब्बारा होते
कोई हवा भरता
कुछ देर खेलता
ऒर फिर-फोड देता
तब तुम
समझ पाते
एक गुब्बारे के फूटने का दर्द
क्या होता हॆ?
किसी बडे या बच्चे के द्वारा
गुब्बारा फोडे जाने में
बडा भारी अन्तर होता हॆ।
बच्चा-
स्वयं गुब्बारा नहीं फोडता
बल्कि गुब्बारा उससे फूट जाता हॆ।
वह गुब्बारा फूटने पर
तुम्हारी तरह कहकहे नहीं लगाता
ब्लकि-
रोता,गिडगिडाता या फिर
आँसू बहाता हॆ।
ऒर फिर-
तुमनें तो

मुझमें-

हवा नहीं-

गॆस भरी थी
बाँध लिया था

एक घागे से
ताकि तुम्हारी मर्जी से उड सकूँ।
तुम कभी धागे को
ढीला छोड देते थे
तो कभी-अपनी ऒर खींच लेते थे।
आह!
कितना खुश हुआ था-मॆं
जब तुमने-
धागे को स्वयं से जुदा करते हुए
कहा था-
कि-अब तुम आज़ाद हॊ।
लेकिन-
हाय री विडम्बना !
ये कॆसी आज़ादी ?
कुछ देर बाद ही
तुमनें जेब़ से पिस्तॊल निकाली
ऒर लगा दिया निशाना
मेरा अस्तित्व !
खण्ड-खण्ड हो
असीम आकाश से
कठोर धरातल पर आ पडा।
काश!
मॆं गुब्बारा न होता
ऒर अगर होता
तो मुझमें
गॆस नहीं-
हवा भरी होती-हवा
वही हवा
जो नहीं उडने देती
गुब्बारे को
खुले आकाश में।
************

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31 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Carrieann के द्वारा
June 14, 2011

Posts like this brighten up my day. Thanks for tainkg the time.

Tufail A. Siddequi के द्वारा
February 13, 2011

विनोद जी अभिवादन, वास्तव में अति सुन्दर रचना. बधाई.

राजीव तनेजा के द्वारा
February 13, 2011

अति सुन्दर

alkargupta1 के द्वारा
February 12, 2011

बहुत सुन्दर कविता , पाराशर जी प्रतियोगिता के लिए मंगल कामनाएं !

Deepak Sahu के द्वारा
February 12, 2011

अति सुंदर महोदय जी! अच्छी कविता है1 मेरे ब्लॉग “प्रेम की सार्थकता” मे आप सादर आमंत्रित हैं! http://deepakkumarsahu.jagranjunction.com/2011/02/09/valentine-contest/ दीपक साहू

    February 12, 2011

    दीपक जी, कविता आपको अच्छी लगी.मेरा प्रयास सफल रहा.धन्यवाद! आपका ब्लाग अवश्य पढने का प्रयास करूंगा.

    Adiana के द्वारा
    June 14, 2011

    Now we know who the sesiblne one is here. Great post!

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 11, 2011

बहुत सुन्दर प्रस्तुति……..

roshni के द्वारा
February 11, 2011

विनोद जी बहुत बढ़िया क्या कहने

    February 11, 2011

    धन्यवाद! रोशनी जी, आपकी प्रतिक्रिया मिलने पर मॆं भी गुब्बारे जॆसा हो गया हूं.

    Makailee के द्वारा
    June 14, 2011

    I bow down humbly in the presence of such gernatess.

Bhagwan Babu के द्वारा
February 11, 2011
वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 11, 2011

आदरणीय पाराशर जी, सही कहा आपने कि कविता के अर्थ कई होते हैं यह तो पढने वाले के ऊपर है कि वो कौन सा अर्थ निकाले|”जा की रही भावना जैसी, हरी मूरत तिन देखि तैसी” आभार सहित,

    February 11, 2011

    वाहिद भाई! सही कहा आपने -जिसकी जॆसी सॊच होगी,वह वॆसा ही अर्थ ग्रहण करेगा’ हॊशला अफजाई के लिए शुक्रिया!

R K KHURANA के द्वारा
February 11, 2011

प्रिय विनोद जी, क्या खूब कहा है ! बहुत सुंदर कविता ! गुब्बारे के माध्यम से एक अच्छी प्रस्तुति आर के खुराना

vinita shukla के द्वारा
February 11, 2011

एक गुब्बारे की विडम्बना का आपने बहुत सुन्दर शब्दों में बखान किया है. contest के लिए शुभकामनाएं.

    February 11, 2011

    विनिता जी, यह’गुब्बारा’ तो केवल माध्यम(कविता की भाषा में प्रतीक मात्र) हॆ.शुभकामनाओं के लिए आपका धन्यवाद!.

nishamittal के द्वारा
February 11, 2011

पाराशर जी ,आपकी कविता बहुत कुछ कहती है,व्यापक अर्थों वाली कविता की बढ़ायी व शुभकामनाएं.और जब आपको द्वितीय पुरूस्कार मिला था उसकी बधाई भी बीलेटेड .

    February 11, 2011

    निशा जी, 28 वर्ष पहले मिले पुरस्कार के लिए, आपकी बधाई स्वीकार करता हूं. बधाई देने में आपकी ओर से कोई बिलंब नहीं हॆ-जागरण जंक्शन के मित्रों को सूचना देने का अवसर ही अब मिला हॆ.खॆर ! आपकी मिठाई तो अभी भी उधार ही रहेगी.

    Kaylin के द्वारा
    June 14, 2011

    At last, someone comes up with the “right” awnser!

nikhil के द्वारा
February 10, 2011

वास्तव में इस रचना में कई अर्थ है.. कविता की विशेषता ही ये है की इसका आयाम बहुत व्यापक होता है….एक गुबारे के रूप में मानवीय संबंधो में समय के सापेक्ष परिवर्तनों को बह्कुबी उकेरा गया है..बहुत बेहतरीन रचना है …


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