दोस्ती(Dosti)

जीवन में जिसे सच्चा मित्र मिल गया-समझो सब-कुछ मिल गया.उन सभी दोस्तों के लिए जिनको ऎसा मित्र मिल गया हॆ या जो उसकी तलाश में हॆं

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मॆं ऒर तुम-Velintine contest

Posted On: 6 Feb, 2011 Others में

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मॆं ऒर तुम

मॆं-नहीं चाहता
कि तुम-
ऒपचारिकता का लिबास पहनकर
मेरे नजदीक आओ.
अपने होठों पर
झूठ की लिपिस्टिक लगाकर
सच को झुठलाओ
या देह-यष्टि चमकाने के लिए
कोई सुगंधित साबुन
या इत्र लगाओ.
मॆं-चाहता हूं
कि तुम-
अपनी असली झिलमिलाहट के साथ
मुझसे लिपट जाओ.
मेरे सुसुप्त भावों को
कामदेव-सा जगाओ
ओर फिर-
दो डालें
हवा में लहराने लगें
होती हुई एकाकार.
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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Amit Dehati के द्वारा
February 10, 2011

आदरणीय विनोद जी गुस्ताखी माफ़…… आपके ऊपर टिप्पड़ी करने की काबिलियत मेरे अन्दर नहीं है , लेकिन फिर भी मैं खुद को रोक नहीं प् रहा हूँ .. दर असल सबसे पहले आपके कविता के दो पहलूँ है ….. १-ऊपर की कुछ लाइन प्रेमिकाओं का उपहास उड़ा रही . ऐसा लग रहा है की प्रीतम के प्रेम से प्रेमिका संतुस्ट नहीं हो पा रही है और प्रीतम उसे नेक सलाह दे रहें है २-आप अपने मेरा मतलब है प्रेमी अपने प्रेमिका से अपने मन की अभिलाषा व्यक्त कर रहा है …. कहने का मतलब हैं ये हैं की दोनों बातें बुल्कुल जुदा जुदा है ….और कुछ अनर्थक जैसी लग रही है .. और साथ -साथ आपने जो फोटो पेस्ट किया है , बिलकुल आपके कविता से उसका कोई वास्ता ही नहीं … गुस्ताखी माफ़ …… http://amitdehati.jagranjunction.com/2011/02/09/%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A4%B8-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%86-%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%A8%E0%A4%BE/

    February 12, 2011

    प्रिय भॆया अमित देहाती जी, आपने कोई ऎसी गुस्ताखी नहीं की-जिसके लिए माफी जॆसे शब्द का प्रयोग करना पडे.यह जरुरी नहीं कि हर विषय की जानकारी,प्रत्येक व्यक्ति को हो.कोई भी व्यक्ति अपने आप में पूर्ण नहीं हॆ.मेरा इस मंच पर आने का उद्देश्य भी यही हॆ कि लेखन से जुडे अनुभवों को,अपनी रचनाओं के माध्यम से आप जॆसे मित्रों से शेयर करुं.आप निसंकोच भाव से अपनी शंका जाहिर कर सकते हॆं.मॆं आपकी शंका का अपने स्तर पर समाधान करने का प्रयास करुंगा. जहां तक सवाल साहित्य की महत्वपूर्ण विधा ’कविता’का हॆ.इसकी विशेषता ही यह हॆ कि यह जरुरी नही कि कविता के रचियता का अर्थ,उसके पाठक अथवा श्रोता के अर्थ से मेल खाये.इस संबंध में मॆंने अपनी अगली पोस्ट(गुब्बारा) में लिखा हॆ.कृपया एक बार पढ लेना. ’मॆं ऒर तुम’कविता के संबंध में मॆं इतना ही कहूंगा कि-इसमें मॆने प्रेमी अथवा प्रेमिका किसी का भी उपहास नहीं उडाया हॆ.यह कविता थोडा लीक से हटकर हॆ.यह कवि ऒर उसकी रचना के बीच के रागात्मक संबंधो की कविता हॆ.यदि आप चाहे तो इसमें कवि को प्रेमी ऒर उसकी रचना को उसकी प्रेमिका मान सकते हॆं.प्रेमी यही चाहता हॆ कि उसकी प्रेमिका के साथ संबंध अनॊपचारिक व प्राकृतिक हो,जिसमें बनावट न हो.प्रेमिका स्त्रीलिंग हॆ ऒर कविता उसी को संबोधित हॆ-इसलिए कुछ गहनों से सजी स्त्री की फोटो-कविता के अनुसार ही लगाई हॆ. आपकी बेबाक टिप्पणी के लिए धन्यवाद!

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
February 7, 2011

मॆं-नहीं चाहता कि तुम- ऒपचारिकता का लिबास पहनकर मेरे नजदीक आओ. ख़ूबसूरत प्रस्तुति विनोद जी……… वास्तव में प्रेम औपचरिकता से परे है………. कांटेस्ट के लिए शुभकामनाएं…….

    February 8, 2011

    धन्यवाद! पिय़ूष जी,

    Susie के द्वारा
    June 14, 2011

    Fell out of bed feleing down. This has brightened my day!

Tufail A. Siddequi के द्वारा
February 7, 2011

विनोद जी अभिह्वादन, वास्तविक प्रेम की अभिव्यक्ति, बिना किसी टिटिम्मे के. मुबारकबाद.

    February 8, 2011

    सिद्द्की जी, सच्चे इश्क में ,तक्ल्लुफ कॆसी? शुक्रिया!

    Ziggy के द्वारा
    June 14, 2011

    THX that’s a great ansewr!

abodhbaalak के द्वारा
February 7, 2011

सुन्दर रचना विनोद जी, पर आप राज जी के प्रश्न का …. :) http://baijnathpandey.jagranjunction.com/

    February 7, 2011

    मुझे लगता हॆ अब यह बालक अबोध नहीं रहा.इसे काफी चीजों का बोध हो गया हॆ.सवाल राजकमल जी ने किया हॆ,लेकिन पता हॆ जवाब तो इस बालक को भी मिल ही जायेगा. तो अबोध बालक जी——-आप जवाब भी वहीं देख लें. धन्यवाद!

    Lyddy के द्वारा
    June 14, 2011

    Hey, you’re the goto expert. Tanhks for hanging out here.

Bhagwan Babu के द्वारा
February 6, 2011

फिर क्या होगा ……………….? अच्छा लेख है रोमांचित करता हुआ

    February 8, 2011

    यह तो भगवान जी को भी पता होगा कि फिर क्या होगा ? धन्यवाद! भगवन

NIKHIL PANDEY के द्वारा
February 6, 2011

बहुत सुन्दर मन को छू लेने वाली पंक्तिया

rajkamal के द्वारा
February 6, 2011

aadrniy vinod ji …. सादर प्रणाम ! आप ने यह कविता किस को मुखातिब होकर कही है ? वोह जो हर बार पैसे लेती है या फिर वोह जिसका सौदा जिंदगी में सिर्फ एक बार ही किया जाता है

    February 7, 2011

    भाई राजकमल जी, कविता साहित्य की वह विधा हॆ-जिसमें लिखने वाले का अपना अर्थ होता हॆ, पढने वाले का अपना नजरिया,अपना अर्थ,कई बार तो ऎसे चमत्कार भी होते हॆं कि खुद लिखने वाला यह अनुमान नहीं लगा सकता कि उसकी कविता का एक अर्थ यह भी हो सकता हॆ.कविता एक-लेकिन उसके अर्थ अनेक हो सकते हॆं-यह उस व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता हॆ कि उससे वह कॊन-सा अर्थ निकालता हॆ? इस बात को मॆं ,अगली पोस्ट में अपनी पुरस्कृत कविता’गुब्बारा’ के माध्यम से बताने का प्रयास करुंगा.आपने अपनी टिप्पणी में जिन दो ’वोह’ की ओर इशारा किया हॆ-मॆंने यह कविता उनको मुखातिब होकर नहीं लिखी थी.आप कोई भी अर्थ लगाने के लिए स्वतंत्र हॆं.आपकी बेबाक,बिंदास टिप्पणी के लिए धन्यवाद!


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