दोस्ती(Dosti)

जीवन में जिसे सच्चा मित्र मिल गया-समझो सब-कुछ मिल गया.उन सभी दोस्तों के लिए जिनको ऎसा मित्र मिल गया हॆ या जो उसकी तलाश में हॆं

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तीन किस्म के जानवर

Posted On: 29 Jan, 2011 Others,मस्ती मालगाड़ी में

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इस जंगल में
तीन किस्म के जानवर हॆं.
पहले-
रॆंगते हॆं
दूसरे-
चलते हॆं
तीसरे-
दॊडते हॆं.
रॆंगने वाले-
चलना चाहते हॆं
चलने वाले-
दॊडना चाहते हॆं.
लेकिन-
दॊडने वाले !
स्वयं नहीं जानते
कि वे
क्या चाहते हॆं?

*****************

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27 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Nodin के द्वारा
June 14, 2011

You have shed a ray of sunshnie into the forum. Thanks!

February 1, 2011

वन्दना जी, रचना आपको अच्छी लगी.धन्यवाद! मेरे लेखन का प्रयास सार्थक रहा.

vandanapushpender के द्वारा
February 1, 2011

कमाल की रचना है विनोद पराशर जी, बहुत बधाई…………..उस मुकाम पर पहुँच जाएं कि जब खुद को ही पता ना हो कि क्या चाहिए तब पतन निश्चित है…………कम शब्दों में एक दम सही अर्थपूर्ण रचना, पुनः बधाई, आदर सहित – वन्दना पुष्पेन्द्र

    Sequoia के द्वारा
    June 14, 2011

    Wow! Great tihnnkig! JK

अजय कुमार झा के द्वारा
January 31, 2011

वाह वाह बहुत खूब परिभाषित किया आपने विनोद भाई ।

preetam thakur के द्वारा
January 31, 2011

पराशर जी ! बहुत सुन्दर !! ये दौड़ने वाले अब बंगाल की खाड़ी के तट पर पहुँच चुके हैं | बस , अब एक धक्का और ??????

    January 31, 2011

    प्रितम जी, शायद बंगाल की खाडी में ,ही इनकी आत्मा को शान्ति मिले.इसलिए धक्का जरा जोर से लगाना.

roshni के द्वारा
January 31, 2011

विनोद जी , जिन्दगी के दौड़ में इतनी आगे निकला जाना की अंत में पता ही न होना की आखिर चाहत क्या थी …… शब्द कम है लेकिन अर्थ बहुत ज्यादा बहुत सुंदर कविता

    January 31, 2011

    रोशनी जी, विडम्बना तो यही हॆ कि-अधिकांश लोग-माया के फेर में इतने उलझ जाते हॆ कि जिंदगी का असली मकसद ही भूल जागे हॆं

    Sparky के द्वारा
    June 14, 2011

    That’s way more clever than I was expecting. Tnhaks!

वाहिद काशीवासी के द्वारा
January 31, 2011

आदरणीय पाराशर जी | तुफ़ैल साहब ने बिलकुल सही कहा|यह रचना लघु होकर भी गहन निहितार्थ रखे हुए है|

    January 31, 2011

    वाहिद भाई, शुक्रगुजार हूं-आपका.

    Jeanette के द्वारा
    June 14, 2011

    Walking in the presence of giants here. Cool thinking all aournd!

Tufail A. Siddequi के द्वारा
January 31, 2011

vinod ji abhivadan, ………….. दॊडने वाले udna चाहते हॆं !

    January 31, 2011

    सिद्दकी जी, दॊडने के बाद उडने की ख्वाहिश-को तो शायद सही ठहराया जा सकता हॆ,लेकिन उनका क्या करें,जो पहले से ही उड रहे हॆ. शुक्रिया.

vinita shukla के द्वारा
January 31, 2011

बड़ी सटीक बात कही आपने विनोद जी. अच्छी पोस्ट के लिए बधाई.

nishamittal के द्वारा
January 31, 2011

पाराशर जी यहाँ आपकी चोटी रचना पर कुछ सीमा तक वही बात लागू होती है,देखन में छोटी लगे घाव करे गंभीर.

    January 31, 2011

    निशा जी, आपकी टिप्पणी में ’चोटी रचना’ को’छोटी रचना’ ही समझूं, कुछ ओर तो नही? ’देखन में छोटी लगे घाव करे गंभीर’-आपका संकेत,शायद कवि-बिहारी जी की ओर हॆ.उनके जॆसी सामर्थ्य मुझमें कहां.फिर भी-उत्साह वर्धन के लिए आपका आभार.

rajkamal के द्वारा
January 30, 2011

आदरणीय विनोद पराशर जी …सादर अभिवादन ! बहुत ही सुंदर कविता गहरे अर्थ लिए हुए ….. हम फिल्म के तिन प्रकार के कीडो वाली बात याद आ गई ….. सुंदर कविता प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद

    January 31, 2011

    शुक्रिया! राजकमल जी, ’हम’फिल्म देखने का सॊभाग्य मुझे नहीं मिल पाया.आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार.

Alka Gupta के द्वारा
January 30, 2011

पाराशर जी , चन्द शब्दों में बहुत अच्छा व्यंग्य !

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
January 29, 2011

आदरणीय विनोद जी…… संक्षेप मे बहुत कुछ कह गए आप……. सुंदर रचना …….. बधाई…..


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