दोस्ती(Dosti)

जीवन में जिसे सच्चा मित्र मिल गया-समझो सब-कुछ मिल गया.उन सभी दोस्तों के लिए जिनको ऎसा मित्र मिल गया हॆ या जो उसकी तलाश में हॆं

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कहां से चले थे, कहां जा रहे हो?

Posted On 25 Jan, 2011 Others में

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क्यों!

बहुत खुश नजर आ रहे हो
गणतंत्र-दिवस की वर्ष-गांठ मना रहे हो
लेकिन-
जरा ये भी तो सोचो
कहां से चले थे, कहां जा रहे हो?
झोंपडी की जगह-
आलीशान बंगला बना लिया
दाल-रोटी छोड दी
फ़ास्ट-फूड खा लिय़ा
कुर्ता-पाजामा छोडकर
फांसी वाला फंदा
गले में लगा रहे हो.
क्यों!

बहुत………………जा रहे हो?

दो-चार कदम चलना भी
मुश्किल हो गया हॆ
किसी को ’यामहा’
तो किसी को ’मारुती’ से
प्यार हो गया हॆ.
बॆल-गाडी छोडकर
हवाई-जहाज उडा रहे हो.
क्यों!

बहुत………………जा रहे हो?

बाप को डॆड
मां को मम्मी
चाचा,फूफा,मांमा को -अंकल
चाची,फूफी,मांमी को-आंटी
कहकर-
रिश्तों को उलझा रहे हो?
क्यों!

बहुत……………..जा रहे हो?

सोने के समय जगना
जगने के समय सोना
सेहत हुई खराब-
तो डाक्टर के आगे रोना.
खुशहाल जिंदगी को
गमगीन बना रहे हो?
क्यों!

बहुत………………जा रहे हो?

स्वतंत्रता का अर्थ-
तुम कुछ ऒर-
वो कुछ ऒर लगा रहे हॆं
शायद इसलिए-
लोकतंत्र के मंदिर में
असुर उत्पात मचा रहे हॆं.
असुर-संग्राम के लिए-
किसी भगतसिंह को बुला रहे हो.
क्यों!

बहुत खुश नजर आ रहे हो
गणतंत्र-दिवस की वर्ष-गांठ मना रहे हो
लेकिन-
जरा ये भी तो सोचो
कहां से चले थे, कहां जा रहे हो?

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21 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Janais के द्वारा
June 14, 2011

Superior thinking demnotsaretd above. Thanks!

rajkamal के द्वारा
January 26, 2011

आदरणीय श्री विनोद पराशर जी ..सादर अभिवादन ! जहाँ एक तरफ आगे बढ़ने के लिए तरक्की बेहद जरूरी है ..वहीँ साथ -२ अपनी जड़ो से जुड़ाव भी बेहद जरूरी है …. आपकी इस हास्य और मनोरंजन से भरी हुई सीख देने वाली कविता ने गणतंत्र का रंग और भी गहरा कर दिया है इस मंच पर …. आपको भी बहुत -२ शुभ कामनाये इस राष्ट्रीय पर्व की

    January 27, 2011

    भाई राजकमल जी, सबसे बडी समस्या तो यही हॆ कि हम इतने तरक्की पसंद हो गये हॆं कि जडो की ओर मुडकर देखना ही पसंद नहीं करते.मनोरंजन के साथ-साथ यदि रचना कोई संदेश भी दे जाये,तो अच्छा ही हॆ.आपकी सार्थक टिप्पणी के लिए धन्यवाद!

    Dorothy के द्वारा
    June 14, 2011

    Hey, that post leeavs me feeling foolish. Kudos to you!

ajaykumarjha1973 के द्वारा
January 26, 2011

बहुत खूब विनोद जी ………वाह क्या खूब बयां किया आपने

    January 26, 2011

    अजय कुमार जी, अपको गणतंत्र-दिवस की शुभकामनायें.रचना पसंद आई-मेरा प्रयास सार्थक रहा. धन्यवाद!

    Berlynn के द्वारा
    June 14, 2011

    Now we know who the senisble one is here. Great post!

roshni के द्वारा
January 26, 2011

विनोद पराशर जी नमस्कार बहुत बहुत ही अच्छी कविता एक दम हट के चिंतन करती हुई ………… गणतंत्र दिवस की शुभ कामनाएं

    January 26, 2011

    गणतंत्र-दिवस की शुभ कामनाओं के साथ रोशनी जी-स्वागत हॆ-आपका. गणतंत्र दिवस के अवसर पर आपको-मेरा कवितामय-चिंतन पसंद आया,शुक्रिया!

Amit Dehati के द्वारा
January 26, 2011

बहुत ही सुन्दर रचना ……….विनोद जी …. ये रचना वाकई एक अलग सन्देश दे रही है ….. गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामना—— फूलों सा खिला खुशियों से भरा, सुख शांति का अम्बार रहे . गम पास न हो शुख आस न हो .. अधरों पे ख़ुशी का सार रहे . ऐसा ही मन कुछ कहता है , तेरा खुशनुमा संसार रहे ….. कृपया मुझे visit करके अपना विचार व्यक्त करें …… HAPPY REPUBLIC DAY ! शुक्रिया !

    Amit Dehati के द्वारा
    January 26, 2011

    कृपया मुझे visit करके अपना विचार व्यक्त करें …… http://amitdehati.jagranjunction.com HAPPY REPUBLIC DAY ! शुक्रिया !

    January 26, 2011

    अमित जी, आप तो देहाती हॆं-आपकी ओर से-जाते जाते HAPPY REPUBLIC DAY ! कहना कुछ अटपटा-सा लगा.शुरु वाली-गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामना-ही ठीक थी.खॆर अन्यथा न लेना. जय हिंद!

Alka Gupta के द्वारा
January 26, 2011

पाराशर जी , आज संस्कृति ,स्वतंत्रता , लोकतंत्र पर लगे हुए बहुत सही प्रश्नचिह्न ! आज के कटु सत्य को दर्शाती हुई सुन्दर रचना ! गणतंत्र दिवस की शुभ कामनाएं !

    January 26, 2011

    अल्का जी, आपको भी गणतंत्र दिवस की मंगलकामनायें! आज के परिपेक्ष्य में संस्कृति ,स्वतंत्रता , लोकतंत्र जॆसे शब्द-लगता हॆ अपने अर्थ खो चुके हॆं.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
January 26, 2011

आदरणीय पाराशर जी| देश और समाज में व्याप्त विषमताओं का चित्रण करती अच्छी कविता के लिए साधुवाद|

    January 26, 2011

    वाहिद जी, उत्साहपूर्ण टिप्पणी के लिए,आपका शुक्रिया. जय हिंद!

NIKHIL PANDEY के द्वारा
January 26, 2011

आदरणीय पराशर जी .. कविता के माध्यम स आपने अब तक हुए बदलाव को बखूबी दिखाया है… वास्तव में बहुत बदल गए है अपनी जड़ो से बहुत ऊपर चले गए…. इतना की अब काटने का दर बन गया है…लोकतंत्र तो कुछ मुट्ठीभर लोगो के लिए ही रह गया है…… गणतंत्र दिवस की शुभकामनाये…

    January 26, 2011

    निखिल जी, आज सही मायने में देखें-तो लोकतंत्र एक मजाक बनकर रह गया हॆ.जिस आम आदमी को ध्यान में रखकर लोकतंत्र को लाया गया था,आज उस लोकतंत्र में सबसे ज्यादा अवहेलना,उस आम आदमी की ही की जा रही हॆ.आज के लोकतंत्र को यदि ’ठोकतंत्र’ की संज्ञा दे दी जाये,तो अतिश्योक्ति न होगी.आपको भी शुभकामनायें.

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
January 25, 2011

पराशर जी ! आपने बहुत ही विचारणीय प्रश्न उठाये हैं …. कहां से चले थे, कहां जा रहे हो? मुझे तो लगता है की हम आधुनिकता के छद्म आकर्षण में इस तरह भागे की हमारी आत्मा, सहृदयता, सहानुभूति, नैतिक मूल्य और हमारी बुद्धि हमारे देह के साथ नहीं आ पाए …… और हम अब तो बस भाग रहे हैं ,………….. बिना सोचे समझे कहाँ से काले थे, कहाँ जा रहे हैं ………..

    January 26, 2011

    भाई शॆलेश जी, सही कहा आपने-वाकई हम एक ऎसी अंधी दॊड में शामिल हो चुके हॆं-जिसकी मंजिल का कुछ भी अता-पता हमे नहीं हॆ.इसी अंधी दॊड पर मेरी एक कविता हॆ-’तीन किस्म के जानवर’.अगली पोस्ट में-इस ब्लाग पर डालने का प्रयास करूंगा.आपकी उत्साह-वर्धक टिप्पणी के लिए आभार.

    Augustina के द्वारा
    June 14, 2011

    That’s way more cleevr than I was expecting. Thanks!


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