दोस्ती(Dosti)

जीवन में जिसे सच्चा मित्र मिल गया-समझो सब-कुछ मिल गया.उन सभी दोस्तों के लिए जिनको ऎसा मित्र मिल गया हॆ या जो उसकी तलाश में हॆं

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सुख ऒर दु:ख

Posted On: 10 Jan, 2011 में

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हम-
यह जानकर
बहुत सुखी हॆं
कि-दुनिया के ज्यादातर लोग
हमसे भी ज्यादा दु:खी हॆं.
पिता-
इसलिए दु:खी हॆ-
कि बेटा कहना ही नहीं मानता
बेटे का दु:ख-
कॆसा बाप हॆ?
बेटे के जज्बात ही नहीं जानता.
मां-
इसलिए दु:खी हॆ-
कि जवान बेटी
रात को देर से घर आती हॆ
बेटी का दु:ख-
शक की सुई-
हमेशा उसी के सामने आकर
क्यों रूक जाती हॆ?
पति-
इसलिए दु:खी हॆ-
कि-उसकी पत्नि
स्वयं को समझदार
ऒर उसे बेवकूफ मानती हॆ
उसकी मां को-
उससे ज्यादा वह जानती हॆ
पत्नी का दु:ख-
उसका पति-
अभी तक भी-
अपनी कमाई-
अपने मां-बाप पर लुटा रहा हॆ
उसे अपने बच्चों का भविष्य
अंधकारमय नजर आ रहा हॆ.
मालिक -
इसलिए दु:खी हॆ-
कि-नॊकर
हराम की खा रहा हॆ
नॊकर का दु:ख-
जी-तोड मेहनत के बाद भी
घर नहीं चल पा रहा हॆ.
ये भी दु:खी हॆं
वो भी दु:खी हॆं
ऒर हम-
यह जानकर-बहुत सुखी हॆं
कि-दुनिया के ज्यादातर लोग
हमसे भी ज्यादा दु:खी हॆ.
=================



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Fanny के द्वारा
June 14, 2011

I’m out of legaue here. Too much brain power on display!

roshni के द्वारा
January 16, 2011

आदरणीय पराशर जी, ऒर हम- यह जानकर-बहुत सुखी हॆं कि-दुनिया के ज्यादातर लोग हमसे भी ज्यादा दु:खी हॆ. सुख और दुःख के बीच के अंतर को बहुत बढ़िया बयाँ किया सुंदर रचना

rajkamal के द्वारा
January 11, 2011

आदरणीय विनोद जी …. सादर अभिवादन ! दूसरों की थाली में हमेशा ही लड्डू बड़ा ही नजर आता है ….. बहुत ही सुन्दर कविता कुछ सोचने पर मजबूर करती हुई … मुबारकबाद

    January 11, 2011

    भाई राजकमल जी, आपने ठीक कहा कि दूसरों की थाली में रखा लड्डू बडा नजर आता हॆ.यही तो विडंबना हॆ कि हम अपनी थाली के लड्डू का स्वाद तो ले नहीं रहे,हां यह सोच-सोचकर अवश्प यरेशान हो रहे हॆं कि पडॊसी की थाली में शायद कुछ बडा लडडू रखा हॆ.उत्साह बढाने के लिए धन्यवाद!.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
January 11, 2011

आदरणीय पराशर जी! आपके सामने तो तुच्छ हूँ इसलिए कहने का सामर्थ्य नहीं फिर भी दुस्साहस कर रहा हूँ| सुख-दुःख, जो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, को सुन्दर ढंग से आपने रखा है| बिना किसी एक की मौजूदगी के दूसरे के महत्व का पता नहीं चल सकता तो हमें कोशिश करनी चाहिए कि समान रूप से दोनों को ही लें| आपको धन्यवाद|

    January 11, 2011

    वाहिद भाई, आप निसंकोच होकर अपनी बात कह सकते हॆं.मॆं भी आपकी ही तरह एक साधारण आदमी हूं.हां लेखन के क्षेत्र से जुडा होने के कारण- कुछ कुलबुलाहट सी बनी रहती हॆ जो कभी कविता तो कभी किसी लेख के रुप में आप जॆसे मित्रों के सामने आ जाती हॆ.आपने ठीक कहा सुख ऒर द:ख एक सिक्के के दो पहलू ही तो हॆं.

Dharmesh Tiwari के द्वारा
January 11, 2011

आदरनीय विनोद जी नमस्ते,इस धरती पर ऐसा कोई भी नहीं जो किसी न किसी मामले में दोनों सुखी और दुखी न हो,धन्यवाद!

    January 11, 2011

    तिवारी जी, यह कविता विशेषरुप से उन लोगों के लिए ही हॆं,जो लोग हमेशा अपने दु:ख का रोना रोते रहते हॆं.जीवन से हतास हो चुके हें.उन्हें अपने दु:ख के अलावा जीवन में कुछ भी नजर ही नहीं आता.

abodhbaalak के द्वारा
January 11, 2011

विनोद जी बहुत ही सुन्दर कविता, आपने हर पक्ष के दुःख को सामने रखा है, सोच रहा हूँ की अगला पोस्ट अब दुःख पर ही लिखूं. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    January 11, 2011

    अबोध जी, आपकी अगली पोस्ट की प्रतिक्षा रहेगी.आपको कविता अच्छी लगी.धन्यवाद!

Harish Bhatt के द्वारा
January 11, 2011

आदरणीय विनोद जी सादर प्रणाम, बहुत ही बेहतरीन कविता के लिए हार्दिक बधाई.

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
January 11, 2011

हर किसी की नज़र से सुख ओर दुख को दिखा दिया है आपने………. सुंदर रचना ………. बधाई………..


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