दोस्ती(Dosti)

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एक हास्य-कवि से-मुक्का-लात नहीं,मुलाकात !

Posted On: 18 Dec, 2010 में

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दिल्ली के कमानी सभागार में,पिछले सप्ताह एक साहित्यिक संस्था द्वारा-’हास्य कवि सम्मेलन’ का आयोजन किया गया.इस कवि सम्मेलन में देश के कई नामी-ग्रामी हास्य कवियों ने भाग लिया.वही पर, ’हसगुल्ले’ की वरिष्ठ संवाददाता कुमारी रसवंती ने, उभरते हुए युवा कवि अनूप ’घायल’, से,.आज

की ’हास्य कविता’ पर बात-चीत की.आप भी पढिये,उस बात-चीत के मुख्य अंश:-

रसवंती:’घायल’ जी नमस्कार !

घायल:(हाथ जोडकर) जी, ’लवस्कार’!

रसवंती :( मुस्कराकर) ये ’लवस्कार’ क्या बला हॆ?

घायल:बला नहीं हॆ.,यह अंग्रेजी व हिंदी भाषा का संगम हॆ.

रसवंती:मॆं कुछ समझी नहीं.

घायल::इसमें समझ में न आने वाली-कॊन सी बात हॆ? ’लव’ अंग्रेजी भाषा से हॆ तथा बाकी

’हिंदी से. दोनों को मिलाकर बन गया ’लवस्कार’.

रसवंती तो आपने अंग्रेजी में हिंदी की मिलावट की हॆ.

घायल:असली चीज आजकल लोगों को पचती ही कहां हॆ? जमाना ही मिलावट का हॆ

रसवंती आपके नाम के साथ यह’घायल’ जो टाईटल जुडा हुआ हॆ,इसका क्या चक्कर हॆ?आप तो

अच्छे-खासे नजर आ रहे हॆं. कहीं कोई जख्म तो नजर नहीं आ रहा.

घायल: (शायराना अंदाज में)

’सभी नगामात,उंचे कंठ से गाये नही जाते

जख्म सीने के,यूं चॊराहे पर दिखलाये नहीं जाते’

रसवंती:अच्छा तो,यह कोई अन्दर की चोट हॆ.चलो! हम तो ईश्वर से प्रार्थना करेंगें कि

आपके जो भी जख्म हॆं,जल्दी भर जायें.

घायल: जी, धन्यवाद!

रसवंती:घायल जी ! आज मंच से जो कवितायें आपने पढी-उनके शीर्षक थे-’कुत्ते’,’सजा हुआ

गधा’ व ’तीन किस्म के जानवर’.कविताओं के शीर्षकों को सुनकर ऎसा नहीं लगता कि

आपकी कवितायें,इंसानों के लिए कम ऒर जानवरों के लिए ज्यादा लिखी गयी हॆं.

घायल:कविता सिर्फ इंसानों के लिए ही लिखी जाती हॆ,जानवरों के लिए नहीं.कई बार आदमी में,

इंसानियत के बजाय पशुता आ जाती हॆ-उस पशुता को बाहर निकालने का काम कविता करती हॆ.कवि को इस तरह की कविता लिखने की प्रेरणा-जानवरों से भी मिल जाती हॆ.उक्त तीनों रचनाओं के साथ भी कुछ ऎसा ही हॆ.

रसवंती:आपको लिखने की प्रेरणा कहां से मिलती हॆ ?

घायल: समाज से.कोई भी कलाकार हो, अपनी कला के लिए प्रेरणा-समाज से ही लेता हॆ.आज

समाज में,हमारे घर-परिवार में,इतनी विसंगतियां हॆं-जो हमारे जॆसे कवियों को-लिखने के लिए प्रेरित करती हॆं.

रसवंती:आप कितने साल से लिख रहे हॆं?

घायल: आज से लगभग 25 साल पहले जब दसवीं कक्षा में पढता था-तभी यह बीमारी लगी थी.

कालेज तक जाते-जाते महामारी हो गयी ऒर अब तो लाईलाज हॆ.

रसवंती:सुना हॆ,जब आप नये-नये कवि बने थे,तो स्वयं पॆसे खर्च करके लोगों को कविता सुनाते

थे,लेकिन आज लिफाफे का वजन देखकर कविता सुनाते हॆं-यह बात कहां तक सही हॆ?

घायल:(हंसते हुए) हा! हा !! हा !!! ठीक सुना हॆ-आपने.वक्त वक्त की बात हॆ.दर-असल जब

नया नया कवि बना था, तो नयी कविता लिखने पर मन में यह इच्छा होती थी कि

लोगों को सुनाकर,उसपर  उनकी प्रतिक्रिया जानूं अब सवाल ये था कि सुनाऊं-किसे ?

जिस संस्थान में,मॆं उस समय कार्य करता था-उसमें मेरे तीन खास मित्र थे-जो मेरे हाव-

भाव देखकर ही भांप लेते थे कि आज कॊई नयी कविता लिखी हॆ.वे व्यस्त न होते हुए

भी व्यस्त होने का बहाना करते थे.मेरी कविता सुनाने की इच्छा जोर मारती थी-मजबूरी

में-कभी चाय पर तो कभी चाय के साथ-साथ बिस्कुट खाने पर –कविता सुनने के लिए

तॆयार होते थे.आज हालात बदल गये हॆं.कविता सुनने से लोगों का मनोरंजन होता हॆ.

अपने मनोरंजन के लिए लोग पॆसे भी खर्च करते हॆं.यदि कविता सुनाने के बदले मॆं

पेसे लेता हूं,तो इसमें बुराई क्या हॆ? रहा सवाल लिफाफे के वजन का. तो एक कहावत

हॆ कि जितना गुड डालोगे,मीठा तो उतना ही होगा..हम भी बाल-बच्चेदार हॆं.फालतू समय

किसके पास हॆ?

रसवंती: कविता लिखने के मामले में,आपको अपने परिवार से कितना सहयोग मिलता हॆ?

घायल: शुरू शुरू में,जब घर की छत पर बॆठकर,कई घंटे तक लिखता रहता था –तो मां कहती थी

“क्यों आंखे खराब कर रहा हॆ? बेकार में कागज काले करता रहता हॆ.यूं नहीं,कोई ढंग का काम कर ले..” अब पत्नी व बच्चे हॆं.मेरे इस काम में उनकी कोई खास रुचि नहीं हॆ.हां!

सहयोग इतना ही काफी हॆ कि जब भी मेरा लिखने का मूड होता हॆ.-वे बीच में व्यवधान

नहीं करते.लेखन के दॊरान पत्नी चाय-पानी पिला देती हॆ.

रसवंती:एक आखरी सवाल-टी.वी,रेडियो ऒर मंच पर कवि-सम्मेलनों में’हास्य-कविता’ के नाम

पर, आजकल जो कुछ सुनाया जा रहा हॆ, क्या आप उससे संतुष्ट हॆं ?

घायल:.जी,बिल्कुल नहीं..’हास्य-कविता’ का संबंध-स्वस्थ मनोरंजन व हल्के-फुल्के संदेश से हॆ.

कुछ लोग फूहडता,अश्लीलता को ’हास्य-कविता’ समझने लगे हॆं जो किसी भी नजरिये से ठीक नहीं हॆ.

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23 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Charl के द्वारा
June 14, 2011

Stands back from the kyeboard in amazement! Thanks!

ambalika के द्वारा
April 26, 2011

सम्मानीय पराशर जी, आपके इस बेहतरीन इन्टरव्यु को पढकर मन को हंसी की पूरी खुराक मिल गयी. बहुत अच्छा लगा. आगे भी आप हास्य से परिपूर्ण लेख लिखते. धन्यवाद………  

allrounder के द्वारा
December 21, 2010

नमस्कार पराशर जी, एक हास्य कवि ये साक्षात्कार सचमुच हास्य से मुक्कालात के बराबर है ! आपको बधाई !

    December 21, 2010

    नमस्कार! आल-राउन्डर जी! हॊसला-अफजाई के लिए,धन्यवाद! इस पिच पर भी आपका स्वागत हॆ.

HIMANSHU BHATT के द्वारा
December 20, 2010

इस मजेदार मुक्का लात से रूबरू करने के लिए शुक्रिया …..

nikhil के द्वारा
December 20, 2010

विनोद जी अभिवादन स्वीकार करे .. बहुत ही मजेदार मुक्का लात हुई .. और इसका आनंद खूब आया पढके… .. बेहतरीन रचना ….

    December 20, 2010

    निखिल जी, रचना पढकर-आपकॊ ’आनंद’ आया.बडी खुशी की बात हॆ.चलो हमें भी ’शान्ति’ मिल गई. धन्यवाद!

December 19, 2010

विनोद जी, नमस्कार. हास्य व्यंग्य से भरपूर इंटरव्यू प्रस्तुत करने के लिए बधाई. कभी राजकमल जी ने कहा था की मुझमे भी कुछ -२ हास्य वयंग्य के जरासीम दिखाई पड़ते है, क्या रसवंती जी मेरा इंटरव्यू नहीं ले सकती?

    December 19, 2010

    भाई राजेन्द्र जी, एक बार-हास्य व्यंग्य के जरासीम दिखाई पडने वाली आपकी रिपोर्ट जरा कन्फर्म हो जाये,तो मॆडम रसवंती जी को आपका नाम भी प्रपोज कर देते हॆं.वॆसे जब से घायल जी का इन्टरव्यू छपा हॆ-कई व्यंग्यकारों का मन -रसवंती को इन्टरव्यू देने के लिए मचल रहा हॆ.

rudrapunj के द्वारा
December 19, 2010

वाह रे घायल जी आप का जबाब लाजबाब है और सबसे पहले आपको मेरा लवस्कार .रसवंती ने खूब रस ले ले कर सवाल किया है और आपने अपने शब्दों के जल में उन्हें खूब घुमाया है . वैसे मई भी एक अदना युवा हास्य व्यंगकार हु और जैसे आप घायल है वैसे मै पुंज लिखता हु अक बार फिर लवस्कार आपका रुद्रनाथ त्रिपाठी पुंज वाराणसी

    December 19, 2010

    भाई पूंज जी, मेरी ओर से भी आपको प्यार-भरा ’लवस्कार’. यह तो ऒर भी खुशी की बात हॆ कि आप भी मेरी तरह हास्य-व्यंग्य में रुचि रखते हॆं.खूब जमेगी,जब मिल बॆठेगें दीवाने-दो.

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
December 19, 2010

मनोरंजक लेख के लिए हार्दिक बधाई…………….

    December 19, 2010

    पियूस जी, लेख पसंद आया-धन्यवाद! आगे भी प्रयास करुंगा-ऒर अच्छा लिख सकूं. कुछ तकनीकी कारणों से,यह जवाब मुझे दुबारा देना पड रहा हॆ,क्योंकि जो उत्तर आपके लिए था वह भी रोशनी जी के खाते में जमा हो गया.कृपया अन्यथा न लेना.

roshni के द्वारा
December 19, 2010

विनोद जी घायल जी की interview तो बहुत अच्छी लगी ……….. सुन्दर रचना के लिए बधाई

rajkamal के द्वारा
December 18, 2010

सर जी …यहाँ पर लिखने का कितना वजनदार लिफाफा मिला है आपको …. मेल कर के बता देना …और गुड मीठा है कि खट्टा ….

    December 18, 2010

    राजकमल जी, प्रतिक्रिया स्वरुप,आप जॆसे मित्रों का जो स्नेह मिलता हॆ, वह उस लिफाफे से कहीं ज्यादा वजनदार हॆ. हां, गुड अगर बिना मसाले का हो,तो वो मीठा ही होता हॆ. यह मेरा सॊभाग्य हॆ कि मुझे बिना मसाले वाला गुड ही मिला हॆ. धन्यवाद!

    Bayle के द्वारा
    June 14, 2011

    Haha. I woke up down today. You’ve cehered me up!

abodhbaalak के द्वारा
December 18, 2010

विनोद जी बहुत ही सुन्दर interview आपने प्रस्तुत किया है, मज़ा आ गया इसे पढ़कर या ये कहें की कवी जी से मिलकर सुन्दर रचना पर बंधाई हो http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    December 18, 2010

    धन्यवाद! अबोध जी, हास्य कवि का इन्टरव्यू आपको पसंद आया.मेरा प्रयास सार्थक रहा.


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